आरक्षण की धुरी पर
On the Axis of Reservation
1990 के मण्डल आन्दोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचित यह काव्य संग्रह सामाजिक न्याय, संवैधानिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक समानता का सशक्त और जनपक्षधर साहित्यिक दस्तावेज है।
A vibrant poetry collection capturing the socio-political dynamics of reservation, representation, and the struggle for constitutional democracy during the historic 1990 Mandal Commission declaration.
← सम्पूर्ण पुस्तकें ग्रन्थ सूची में वापस जाएं (All Books Catalog)
पुस्तक ऑनलाइन उपलब्धता एवं क्रय / Purchase Book Online
विषय सूची एवं अध्याय रूपरेखा / Table of Contents
नीचे दिए गए अध्यायों पर क्लिक करके सीधे उस अध्याय के विस्तृत शोध विवरण पर जाएं:
पुस्तक से लिए गए मुख्य वैचारिक निष्कर्ष / Core Research Discoveries
ग्रन्थ के प्रमुख ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं समाजशास्त्रीय उद्घाटन बिन्दु:
आरक्षण दया नहीं, संवैधानिक प्रतिनिधित्व है
आरक्षण कोई आर्थिक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं, बल्कि सदियों से सत्ता और प्रशासन से बाहर रखे गए बहुसंख्यक समाज का शासन में वैध संवैधानिक प्रतिनिधित्व है।
1990 मण्डल आन्दोलन का जीवंत साक्षी
इस काव्य संग्रह की 90 प्रतिशत रचनाएं 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह द्वारा मण्डल आरक्षण लागू करने की ऐतिहासिक घोषणा के दौर में रची गईं।
कवि-हृदय और समाजशास्त्रीय दृष्टि का समन्वय
डॉ. निर्मोही ने एक समाज वैज्ञानिक की वस्तुनिष्ठता और एक संवेदनशील जन-कवि की भावनात्मक तीव्रता के साथ वंचितों के आक्रोश और आशाओं को वाणी दी है।
लोकतंत्र की वास्तविक धुरी
जिस प्रकार धुरी के बिना पहिया नहीं घूम सकता, उसी प्रकार बहुसंख्यक श्रमजीवी जनता की न्यायपूर्ण हिस्सेदारी के बिना लोकतंत्र का रथ आगे नहीं बढ़ सकता।
आरक्षण की धुरी पर — सदियों की चुप्पी की आवाज
On the Axis of Reservation: The Voice of Centuries
यह केवल पदों का बंटवारा नहीं, यह सदियों की चुप्पी की आवाज है,
जिस धुरी पर घूम रहा लोकतंत्र, आरक्षण उसी न्याय का साज है…
इस संग्रह की कविताएं आम जन की बोलचाल की भाषा में लिखी गई हैं, जो सीधे दिल को छूती हैं। कवि ने आरक्षण के विरोधियों के पाखंड को उजागर करते हुए यह स्थापित किया है कि जाति के आधार पर सदियों तक जिसने शोषण सहा, उसे न्याय भी उसी आधार पर मिलना चाहिए।
Presents poignant lyricism asserting that affirmative action is not charity, but the indispensable fulcrum upon which true constitutional democracy pivots.
हक और हिस्सेदारी का सवाल : सत्ता के गलियारों में दस्तक
Demanding Equal Stakes in Statecraft and Administration
कवि पूछता है कि जब खेतों में पसीना हम बहाते हैं, सीमाओं पर जान हम देते हैं, कारखानों में पहिया हम घुमाते हैं, तो फिर न्यायालयों, विश्वविद्यालयों और मंत्रालयों में हमारी हिस्सेदारी शून्य क्यों है?
यह कविता संग्रह केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक जन-आन्दोलन का वैचारिक घोषणा-पत्र है।
Vigorously advocates for equitable representation of agrarian and artisanal classes in the judiciary, bureaucracy, and academia.
संविधान, समानता और मानवीय गरिमा
Constitutional Equality, Human Dignity and Babasaheb’s Vision
डॉ. भीमराव अम्बेडकर के समतामूलक विचारों को कवि ने अपनी कविताओं में लयबद्ध किया है। संविधान सभा के संकल्पों को दोहराते हुए कवि घोषणा करता है कि भारत तभी महाशक्ति बन सकता है जब उसका अंतिम व्यक्ति भी सिर उठाकर जी सके।
Connects Dr. B. R. Ambedkar’s constitutional framework with grass-roots struggle for human dignity.
सामाजिक परिवर्तन में जन-कविता की भूमिका
Literary & Sociological Evaluation of Dr. Nirmohi’s Verses
साहित्यिक आलोचकों ने इस ग्रन्थ को ‘क्रांतिकारी जन-काव्य’ की श्रेणी में रखा है। यह पुस्तक न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए बल्कि समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए भी अनिवार्य अध्ययन सामग्री है।
Celebrated by literary critics as a seminal example of socio-political subaltern literature combining rigorous analysis with popular verse.
📚 सम्पूर्ण पुस्तकें ग्रन्थ सूची देखें (Explore All Books Catalog) →