क्या हमारे पर्व केवल आस्था हैं — या हज़ारों साल पुराने कृषि-कैलेंडर?
Are our festivals only faith — or ancient agricultural calendars?
उत्सवों का समाजशास्त्र
Social Science of Indian Festivals
भारतीय पर्वों एवं त्यौहारों के पीछे छिपे वैज्ञानिक, आर्थिक एवं सामाजिक आधार
मौलिक शोधशोध ग्रन्थ
"उत्सवों का समाजशास्त्र" पुस्तक भारतीय उत्सवों की धार्मिक व्याख्या से हटकर समाज वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करती है। यह अपने ढंग का अनूठा प्रयास है। इसमें कृषि प्रधान भारत में कृषि सन्दर्भों के साथ ही प्रकृति के बीच मानव जीवन के समस्त पक्षों को उत्सवों की क्रिया-विधि के रूप में देखा गया है।
होली विश्व का पहला पर्व है। इसका जन्म आदिम अवस्था में हुआ था, जबकि मानव नंगे बदन जंगल में निवास करता था। उस समय होली शीत से मानव जीवन को बचाने का माध्यम बन गयी। शीत ऋतु में अलाव के रूप में नित्य जलने वाली छोटी-छोटी होली का विदायी समारोह ही होलिकोत्सव है। होली ने शीत से मानव के प्राणों की रक्षा की थी। अतः होली मां बन गयी। प्रहलाद की काल्पनिक कहानी तो भगवान को प्रस्थापित करने के लिए बाद में जोड़ी गयी। होली जहां पर रबी की फसल का पर्व है, वहीं पर यह नव-वर्षोत्सव भी है। विश्व के लोग जब नव-वर्ष की कल्पना भी नहीं करते थे तब भारतीय होली के रूप में नववर्षोत्सव मनाते थे। होली जलने(फाल्गुन पूर्णिमा) के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंग-गुलाल और पकवानों के साथ मनाया जाने वाला उत्सव नव-वर्ष के स्वागत का ही उत्सव है।
दीवाली विश्व का दूसरा पर्व है। यह धान/धन के जन्मोत्सव का पर्व है। यह भौतिकता की आराधना से जुड़ा कृषि पर्व है। इसका दीवाली नामकरण दीवाल के आधार पर हुआ है। खेतों में धान रूपी धन पड़ा हो और घरों की दीवालों को चूहों और वर्षात ने खराब कर दिया हो तो घर की मरम्मत आवश्यक थी। अतः दीवालों की मरम्मत, सफाई आदि के साथ धन आने की खुशी में दीवाली उत्सव मनाया गया।
The book offers a sociological rather than a religious explanation of Indian festivals, reading them against agriculture and the rhythms of nature. It presents Holi as the world's first festival and new-year celebration (originating as protection against cold), and Diwali as the second, a festival of repairing walls and welcoming the paddy harvest as wealth, and it similarly reinterprets Rakshabandhan, Devsthan Ekadashi, Mahashivaratri, Akshaya Tritiya, Pongal, Onam and Bihu.
पुस्तक के अनुसार होली विश्व का पहला पर्व है, जिसका जन्म आदिम अवस्था में शीत से रक्षा के लिए हुआ।
होली की आग में रबी का नवान्न (जौ, चना) डालना शस्येष्टि है और होली कृषि का पर्व भी है।
पुस्तक ‘होली’ नाम को होला/होलक (आग में भुनी अधपकी फली) से निष्पन्न बताती है।
दीवाली को पुस्तक विश्व का दूसरा पर्व, दीवालों की मरम्मत और धान रूपी धन का जन्मोत्सव बताती है।
देवस्थान एकादशी को पुस्तक देवोत्थान नहीं, ईख (गन्ने) का विवाहोत्सव बताती है।
अक्षय तृतीया को पुस्तक खेती की शुरुआत और जुताई का पर्व बताती है।
पुस्तक में चर्चित प्रमुख पर्व
01होली नववर्षोत्सवHoli: The New-Year Festival
होली विश्व का पहला पर्व है। इसका जन्म आदिम अवस्था में हुआ था, जबकि मानव नंगे बदन जंगल में निवास करता था। उस समय होली शीत से मानव जीवन को बचाने का माध्यम बन गयी। शीत ऋतु में अलाव के रूप में नित्य जलने वाली छोटी-छोटी होली का विदायी समारोह ही होलिकोत्सव है। होली ने शीत से मानव के प्राणों की रक्षा की थी। अतः होली मां बन गयी।
- होली/होलिका क्या है?
- होलकोत्सव ही होलिकोत्सव
02दीवाली (दीपावली)Diwali: Festival of Walls and the Birth of Paddy-as-Wealth
दीवाली विश्व का दूसरा पर्व है। यह धान/धन के जन्मोत्सव का पर्व है। यह भौतिकता की आराधना से जुड़ा कृषि पर्व है। इसका दीवाली नामकरण दीवाल के आधार पर हुआ है। खेतों में धान रूपी धन पड़ा हो और घरों की दीवालों को चूहों और वर्षात ने खराब कर दिया हो तो घर की मरम्मत आवश्यक थी। अतः दीवालों की मरम्मत, सफाई आदि के साथ धन आने की खुशी में दीवाली उत्सव मनाया गया।
03रक्षाबन्धनRakshabandhan
रक्षाबन्धन भाई-बहन के स्नेह का पर्व बाद में बना। पहले यह स्वर्गलोक से आये आर्यों (बाद के भूसुर ब्राह्मणों) के संरक्षण का पर्व था। भारतीयों ने आर्य ब्राह्मणों को शरण देकर यहां बसाया था। अतः उनके संरक्षण का पर्व रक्षाबन्धन शुरू हुआ।
04देवस्थान एकादशी (देवोत्थान एकादशी)Devsthan Ekadashi
देवस्थान एकादशी पर्व भगवान के चार माह तक सोकर उठने के उपलक्ष्य में 'देवोत्थान' (देव + उत्थान) एकादशी नहीं है। यह तो कुंआरी ईख का विवाहोत्सव है। ईख मीठा रस देकर मानव जीवन को खुशहाल बनाती है। अतः वह जहां पैदा होती है, उस स्थान को देवस्थान कहा गया और उसके उपलक्ष्य में देवस्थान एकादशी उत्सव शुरू हुआ। इसके पहले ईख को छूना मना होता है। इसीलिए ईख के विवाह के साथ हिन्दुओं में विवाह भी शुरू हो जाते हैं।
05महाशिवरात्रिMahashivaratri
महाशिवरात्रि उत्सव विश्व का पहला प्रेम दिवस है। शिवलिंग पूजा कल्याणकारी लिंग (स्त्री लिंग तथा पुल्लिंग) को स्वस्थ कार्यशील बनाये रखने का संकेत है। इसका सम्बन्ध धार्मिक कम, जैवकीय, मनोवैज्ञानिक तथा समाजशास्त्रीय पक्षों से अधिक है।
06अक्षय तृतीयाAkshaya Tritiya
अक्षय तृतीया खेती के प्रारम्भ का उत्सव है। इस दिन भूमि की जुताई आवश्यक मानी गयी है जिससे बैसाख और जेठ की गर्मी में मिट्टी जलकर खाद बन जाय और आगे की फसलें अधिक पैदावार देने में सक्षम हो जायें। इस दिन की जुताई से अन्न अक्षय हो जाता है, इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहा गया।
07पोंगल/खिचड़ी, ओणम और बिहूPongal/Khichdi, Onam and Bihu
पोंगल या खिचड़ी पर्व राष्ट्रीय एवं सामाजिक एकीकरण से संबंध रखता हैं तो ओणम विश्व विजेता महाराज बलि के सम्मान से जुड़ा है और असम का बिहू उत्सव नए वर्ष के स्वागत का उत्सव है ।
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‘होली’ नाम का स्रोत: होलक
गहराई से देखने पर ज्ञात होता है कि 'होली' यह नामकरण होला/होलक से निष्पन्न है। आजकल हरा चना या मटर की फली, हरी मूंगफली इत्यादि फली वाले अन्न को आग में भूनकर खाया जाता है। इस भुनी फली को ‘होला' कहा जाता है। जौ, गेहूं की हरी पकी बाली भी भुनने पर हाबुस और कहीं-कहीं होला ही कही जाती है। संस्कृत भाषा में इस होला को 'होलक' कहा जाता है। शब्द कल्प-द्रुम के अनुसार तिनकों की अग्नि में भुने हुए शमीधान्य (फली वाले हरे पके अन्न) को 'होलक' कहते हैं।' भाव प्रकाश जैसे वैद्यक शास्त्र में भी अधपके फली वाले अन्न को 'होलक' कहते हैं जो बात, कफ, चर्बी और श्रम के दोषों को दूर करता हैं।' यह होलक नयी फसल की फलियों का होता है।
डॉ. श्याम लाल सिंह देव निर्मोही द्वारा लिखित 'उत्सवों का समाज शास्त्र' हिन्दू उत्सवों का समाजशास्त्रीय विवेचन हैं। आप का प्रयास उत्सवों को धार्मिकता की कूप-मण्डूकता से मुक्ति दिलाकर उन्हें उनके वैज्ञानिक सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में देखने का है। यह प्रयास प्रशंसनीय है, विशेष रूप से वर्तमान सन्दर्भ में।
डॉ. निर्मोही की उत्सवों की वैज्ञानिक व्याख्या के बाद तो ऐसा लगने लगा है कि भारतीय समाज एवं संस्कृति, उसके इतिहास, चिन्तन, राजनीति इत्यादि को धार्मिक आवरण से हटाकर उसे सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, ऋषिक जैसे सन्दर्भो में देखने की जरूरत हैं। वास्तव में डॉ. निर्मोही ने भारतीय उत्सवों के जन्मदाता के रूप में भारतीय समाज के उपेक्षित, शोषित, पीड़ित अन्नदाता कृषकों को सामने लाकर इतिहास लेखन को नयी दृष्टि प्रदान की है।
उत्सव किसी भी समाज के जीवन में हमेशा रहेंगे। इन्हीं उत्सवों को वैज्ञानिक, सामाजिक परिवेश देना होगा। डा. निर्मोही ने यही प्रयास किया है। आप ने प्राचीन हिन्दू उत्सवों को नये तथा वैज्ञानिक कलेवर में प्रस्तुत कर सराहनीय कार्य किया है। डॉ. निर्मोही जी की उत्सवों को देखने परखने की समाजशास्त्रीय दृष्टि सभी समाज वैज्ञानिकों के लिए रोचक तो होगी ही, भविष्य में सभी समाजों में उत्सवों के अध्ययन के लिए मार्गदर्शक भी बनेगी। ऐसी मेरी धारणा एवं विश्वास है।
हमने देखा कि भारत की आधारशिला कृषि पर आधारित रही है और आज भी भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसका यह स्वरूप हजारों साल से ऐसा बना हुआ है। मुझे लगा कि भारतीय संस्कृति सहित उत्सवों आदि का कृषि से गहरा सम्बन्ध होना चाहिए। अतः मैं इसकी खोज में लग गया तो उत्सवों के क्रैषिक सन्दर्भों का पता चला। इससे यह भी पता चला कि भारतीय उत्सव मुख्य रूप से कृषि पर्व हैं, जिन्हें बाद में आध्यात्मिक या धार्मिक स्वरूप प्रदान किया गया।
उत्सवों का समाजशास्त्र
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