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आरक्षण की धुरी पर
सामाजिक चेतना, संवैधानिक दर्शन एवं वैचारिक काव्य

आरक्षण की धुरी पर

On the Axis of Reservation

लेखक: डॉ. श्यामलाल निर्मोही
भाषा: हिन्दी व अंग्रेजी सारांश
प्रकाशन: New India Publications
शोध प्रकार: काव्य संग्रह एवं समाजशास्त्रीय विमर्श

📖 ग्रन्थ का मूल निष्कर्ष / Research Thesis:

1990 के मण्डल आन्दोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचित यह काव्य संग्रह सामाजिक न्याय, संवैधानिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक समानता का सशक्त और जनपक्षधर साहित्यिक दस्तावेज है।

A vibrant poetry collection capturing the socio-political dynamics of reservation, representation, and the struggle for constitutional democracy during the historic 1990 Mandal Commission declaration.


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पुस्तक से लिए गए मुख्य वैचारिक निष्कर्ष / Core Research Discoveries

ग्रन्थ के प्रमुख ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं समाजशास्त्रीय उद्घाटन बिन्दु:

01

आरक्षण दया नहीं, संवैधानिक प्रतिनिधित्व है

आरक्षण कोई आर्थिक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं, बल्कि सदियों से सत्ता और प्रशासन से बाहर रखे गए बहुसंख्यक समाज का शासन में वैध संवैधानिक प्रतिनिधित्व है।

02

1990 मण्डल आन्दोलन का जीवंत साक्षी

इस काव्य संग्रह की 90 प्रतिशत रचनाएं 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह द्वारा मण्डल आरक्षण लागू करने की ऐतिहासिक घोषणा के दौर में रची गईं।

03

कवि-हृदय और समाजशास्त्रीय दृष्टि का समन्वय

डॉ. निर्मोही ने एक समाज वैज्ञानिक की वस्तुनिष्ठता और एक संवेदनशील जन-कवि की भावनात्मक तीव्रता के साथ वंचितों के आक्रोश और आशाओं को वाणी दी है।

04

लोकतंत्र की वास्तविक धुरी

जिस प्रकार धुरी के बिना पहिया नहीं घूम सकता, उसी प्रकार बहुसंख्यक श्रमजीवी जनता की न्यायपूर्ण हिस्सेदारी के बिना लोकतंत्र का रथ आगे नहीं बढ़ सकता।

Poetry Selection 1 / कविता चयन १

आरक्षण की धुरी पर — सदियों की चुप्पी की आवाज

On the Axis of Reservation: The Voice of Centuries

यह केवल पदों का बंटवारा नहीं, यह सदियों की चुप्पी की आवाज है,
जिस धुरी पर घूम रहा लोकतंत्र, आरक्षण उसी न्याय का साज है…

— डॉ. श्यामलाल निर्मोही (आरक्षण की धुरी पर)

इस संग्रह की कविताएं आम जन की बोलचाल की भाषा में लिखी गई हैं, जो सीधे दिल को छूती हैं। कवि ने आरक्षण के विरोधियों के पाखंड को उजागर करते हुए यह स्थापित किया है कि जाति के आधार पर सदियों तक जिसने शोषण सहा, उसे न्याय भी उसी आधार पर मिलना चाहिए।

🌐 Academic & Sociological Analysis (English):

Presents poignant lyricism asserting that affirmative action is not charity, but the indispensable fulcrum upon which true constitutional democracy pivots.

Poetry Selection 2 / कविता चयन २

हक और हिस्सेदारी का सवाल : सत्ता के गलियारों में दस्तक

Demanding Equal Stakes in Statecraft and Administration

कवि पूछता है कि जब खेतों में पसीना हम बहाते हैं, सीमाओं पर जान हम देते हैं, कारखानों में पहिया हम घुमाते हैं, तो फिर न्यायालयों, विश्वविद्यालयों और मंत्रालयों में हमारी हिस्सेदारी शून्य क्यों है?

यह कविता संग्रह केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक जन-आन्दोलन का वैचारिक घोषणा-पत्र है।

🌐 Academic & Sociological Analysis (English):

Vigorously advocates for equitable representation of agrarian and artisanal classes in the judiciary, bureaucracy, and academia.

Poetry Selection 3 / कविता चयन ३

संविधान, समानता और मानवीय गरिमा

Constitutional Equality, Human Dignity and Babasaheb’s Vision

डॉ. भीमराव अम्बेडकर के समतामूलक विचारों को कवि ने अपनी कविताओं में लयबद्ध किया है। संविधान सभा के संकल्पों को दोहराते हुए कवि घोषणा करता है कि भारत तभी महाशक्ति बन सकता है जब उसका अंतिम व्यक्ति भी सिर उठाकर जी सके।

🌐 Academic & Sociological Analysis (English):

Connects Dr. B. R. Ambedkar’s constitutional framework with grass-roots struggle for human dignity.

Evaluation / समीक्षा

सामाजिक परिवर्तन में जन-कविता की भूमिका

Literary & Sociological Evaluation of Dr. Nirmohi’s Verses

साहित्यिक आलोचकों ने इस ग्रन्थ को ‘क्रांतिकारी जन-काव्य’ की श्रेणी में रखा है। यह पुस्तक न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए बल्कि समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए भी अनिवार्य अध्ययन सामग्री है।

🌐 Academic & Sociological Analysis (English):

Celebrated by literary critics as a seminal example of socio-political subaltern literature combining rigorous analysis with popular verse.

✍️

लेखक की कलम से… / Author’s Perspective

डॉ. श्यामलाल निर्मोही के व्यक्तिगत विचार एवं शोध-दृष्टि

1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री वी. पी. सिंह ने मण्डल आरक्षण की घोषणा की, तो सम्पूर्ण समाज में भूचाल आ गया। एक संवेदनशील समाजशास्त्री और कवि के रूप में मैंने उस उथल-पुथल को देखा और महसूस किया।

यह काव्य संग्रह 1990-91 के उस ऐतिहासिक संघर्ष का दस्तावेजीकरण है। यह पुस्तक उन सभी युवाओं को समर्पित है जो एक न्यायपूर्ण और समतावादी समाज का सपना देखते हैं।

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