सम्राटों के वंशज दलित
Depressed Class: Descendants of Emperors
ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं वैदिक साक्ष्यों से यह प्रमाणित होता है कि भारत के दलित और वंचित समुदाय प्राचीन भारत के मूल शासक, दुर्ग-निर्माता और गणराज्यों के सम्राटों के वंशज हैं, जिन्हें उत्तर वैदिक सत्ता संघर्ष में पराजय के बाद सत्ता और ज्ञान से वंचित किया गया।
A breakthrough historical re-examination uncovering how India’s marginalized communities were originally sovereign monarchs, fort builders, and republic founders displaced following ancient political upheavals.
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पुस्तक से लिए गए मुख्य वैचारिक निष्कर्ष / Core Research Discoveries
ग्रन्थ के प्रमुख ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं समाजशास्त्रीय उद्घाटन बिन्दु:
असुर सम्राटों के प्रत्यक्ष वंशज
आज के दलित और वंचित वर्ग उत्तर वैदिक काल के उन पराक्रमी असुर सम्राटों के वंशज हैं जिन्होंने सदियों तक विदेशी आक्रमणकारियों को पराजित किया और इस उपमहाद्वीप के दुर्गों व नगरों का निर्माण किया।
‘पैरों से उत्पत्ति’ का ऐतिहासिक सत्य
पुरुष सूक्त में ‘पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति’ का वास्तविक अर्थ शारीरिक पैर नहीं, बल्कि राजनीतिक पराजय के बाद विजयी शासक समूहों द्वारा पैरों तले कुचला जाना और पददलित (दलित) बनाया जाना है।
श्रमजीवियों के बल पर जीवित रहा भारत
हिन्दू संस्कृति और भारत का भौतिक अस्तित्व शूद्रों और दलितों के श्रम, कृषि, धातु-शिल्प और सैन्य पराक्रम के बल पर ही जीवित रहा। सभ्यता का सारा निर्माण श्रमजीवी हाथों ने किया।
राजनीतिक व शैक्षणिक अधिकारों का हरण
पराजित शासक कुलों को उत्पादन से तो जोड़े रखा गया, किंतु उन्हें पुनः सत्ता प्राप्त करने से रोकने के लिए शस्त्र और शास्त्र (शिक्षा) के अधिकार से कानूनन वंचित कर दिया गया।
दलित-पिछड़े एकीकरण में भारत का भाग्योदय
भारत का वास्तविक विकास और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण दलित और पिछड़े वर्गों के सामाजिक एकीकरण में निहित है। इतिहास की यह सच्चाई उन्हें हीनभावना से मुक्त करती है।
मूलनिवासी सम्राट और प्राचीन भारतीय गणराज्य
Indigenous Sovereigns and the Builders of Early Forts & Republics
इतिहास गवाह है कि जो आज सामाजिक रूप से हाशिए पर हैं, वे कभी इस उपमहाद्वीप के दुर्गों, नगरों और गणराज्यों के निर्माता और शासक थे। सिन्धु घाटी से लेकर मगध और दक्षिण के विशाल साम्राज्यों तक मूलनिवासी राजवंशों ने ही शासन किया।
नाग, असुर, कोल, भील, और व्रात्य शासकों के शिलालेख और पुरातात्विक अवशेष आज भी समूचे भारत में बिखरे पड़े हैं, जो उनके राजसी अतीत की गवाही देते हैं।
Presents epigraphic and archaeological proof demonstrating that marginalized communities were historically sovereign monarchs and fort builders across the subcontinent.
उत्तर वैदिक सत्ता संघर्ष और सामाजिक स्तरीकरण
Post-Vedic Power Struggles and Systemic Disenfranchisement
उत्तर-वैदिक काल में जब विदेशी आगंतुकों ने स्थानीय दरबारों में पुरोहिती और कूटनीति के माध्यम से पैठ बनाई, तब सत्ता का भीषण संघर्ष हुआ।
युद्धों और षड्यंत्रों में पराजित होने के बाद मूलनिवासी सम्राट कुलों को बंदी बना लिया गया। उन्हें जीवित तो रखा गया ताकि वे कृषि, भवन निर्माण और दस्तकारी से समाज को चलाएं, किंतु उन पर कठोर सामाजिक प्रतिबंध लगा दिए गए।
Details how ancient sovereign dynasties were systematically disenfranchised from arms and education following post-Vedic political upheavals.
पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति का वास्तविक अर्थ
Deconstructing the Allegory: Subjugation, Not Anatomy
पुरुष-प्रधान ग्रन्थों में रूपक गढ़ा गया कि ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय बाहु से, वैश्य जांघ से और शूद्र पैर से पैदा हुए। कोई भी तार्किक व्यक्ति यह समझ सकता है कि कोई मानव किसी के पैर या मुख से जन्म नहीं ले सकता।
‘पैर से उत्पत्ति’ का सीधा समाजशास्त्रीय अर्थ है कि जो युद्ध में पराजित होकर ‘पैरों तले कुचल दिए गए’, वे पददलित (दलित) कहलाए। यह एक राजनीतिक पराजय का रूपक था, जिसे धार्मिक सिद्धांत बना दिया गया।
Scientifically deconstructs the Purusha Sukta allegory, proving that ‘origin from feet’ signifies military subjugation and political crushing, not biological origin.
हिन्दू संस्कृति के निर्माण में श्रमजीवियों का योगदान
Subaltern Labor as the True Foundation of Indian Heritage
यह पुस्तक अंततः यह घोषणा करती है कि भारत की वास्तविक संस्कृति श्रमजीवियों की संस्कृति है। अजंता-एलोरा की गुफाएं हों, तंजौर के विशाल मंदिर हों या सिंधु घाटी के सुनियोजित नगर—इन सभी का निर्माण शूद्र और दलित कारीगरों के खून-पसीने से हुआ।
Affirms that the monumental architecture, agrarian wealth, and artistic heritage of India are the direct legacy of subaltern artisans and laborers.
बहुजन एकीकरण और ऐतिहासिक स्वाभिमान
Restoration of Historical Truth & Democratic Renaissance
डॉ. निर्मोही का यह शोध ग्रन्थ दलित और पिछड़े समाज को हीनभावना से बाहर निकालता है। जब एक समाज यह जान लेता है कि उसके पूर्वज कोई गुलाम नहीं, बल्कि इस धरती के शासक और निर्माता थे, तो उसमें अदम्य लोकतांत्रिक स्वाभिमान जाग उठता है।
Empowers historically disadvantaged communities by reclaiming their royal lineage and inspiring democratic solidarity.
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नमस्कार सर
मैं कच्छ गुजरात से हूँ। सर आपकी किताब ‘सम्राटों के वंशज दलित’ मुझे खरीदनी है तो ये किताब मुझे कहा से मिलेगी ? कृपया जरुर बताये
नमस्कार दीपक जी,
बहुत बहुत धन्यवाद् आपको ये किताब अच्छी लगी।
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डॉ श्याम निर्मोही